उत्पत्ति

स्वामी योगानंद जी द्वारा लिखी ‘ऑटो बायोग्राफी ऑफ ए योगी’ में उनके श्रद्धेय गुरु श्री युक्तेश्वर गिरी ने बाइबल में दी गई उत्पत्ति का इन शब्दों में उल्लेख किया है:

Biblical vector illustration of Adam and Eve, a serpent deceives Eve into eating fruit from the forbidden tree

श्री युक्तेश्वर गिरी ने ईसाई बाइबल का आशय सुंदर रूप से स्पष्ट किया है।जब श्री योगानंद स्वामी ने बड़े रोष के साथ अपने गुरु के समक्ष व्यक्त किया, “यह आदम और हव्वा की कहानी मेरी समझ से बाहर है, आखिर क्यों ईश्वर ने ना केवल उस दोषी जोड़े को सज़ा दी, बल्कि उनकी अजन्मी मासूम पीढ़ियों को भी”। इस पर गुरु ने शिष्य को बाइबिल में दी गई उत्पत्ति का अर्थ इस प्रकार समझाया:-

उत्पत्ति एक गहन एवं प्रतीकात्मक विषय है और इसकी शाब्दिक व्याख्या से यह पकड़ में नहीं आता ।इसमें बताया गया ‘जीवन का वृक्ष’,  एक मानव शरीर है। मेरुदंड एक उलटे हुए वृक्ष की भांति है। आदमी के बाल उसकी जड़े हैं तथा अभिवाही तथा अपवाही नसें उसकी शाखाएं हैं। तंत्रिका तंत्र का यह वृक्ष अनेक सुखद फलों से लदा है, यानी दृष्टि की, ध्वनि की, स्वाद की, स्पर्श की और सूँघने की संवेदनओं से। मनुष्य इन का अधिकार पूर्वक आनंद उठा सकता है लेकिन उसके लिए कामुकता का अनुभव वर्जित था ,शरीर के मध्य में ‘सेब’, (बगीचे के बीच में )।

‘सर्प’ एक रीढ़ में कुंडलित ऊर्जा का प्रतीक है, जो काम की तंत्रिकाओं को उत्तेजित करता है । आदम ‘तर्क’ है तथा हव्वा ‘भावना’ है । जब किसी मनुष्य की भावुकता या स्त्री चेतना मैथुन आवेग से पराजित हो जाती है तब उसका तर्क या आदम भी शिकार हो जाता है।

प्रभु ने मानव जाति का निर्माण अपनी ‘संकल्प शक्ति’ द्वारा, आदमी और औरत के शरीरों को प्रकट करके किया। उन्होंने नई जाति को इसी तरह त्रुटिहीन या दैवी तरीके से बच्चों को सृजन करने की शक्ति से संपन्न किया। क्योंकि उसका (प्रभु का) प्रत्यक्षीकरण वैयक्तीकृत आत्माओं में अभी तक पशु तक ही सीमित था – प्रवृत्ति बद्ध एवं तर्क की क्षमता से हीन। प्रभु ने जो प्रथम मानव शरीर बनाए, वे प्रतीक रूप से आदम और हव्वा कहलाए। इनके लाभकारी आरोही विकास के लिए उसने इसमें दो पशुओं की आत्मा या दैवी अर्क का अंतरण किया; आदम या आदमी में तर्क प्रधान था, हव्वा या औरत में भावना का प्रभुत्व था। इस प्रकार द्वैत या विपरीतता को अभिव्यक्त किया गया जो दृष्टिगोचर लोकों का आधार है। तर्क और भावना सहयोगी आनंद के स्वर्ग में रहते हैं जब तक मानव की बुद्धि पाशविक प्रवृत्तियों की सर्पिल शक्ति के छल में नहीं आती।

इस प्रकार मानव शरीर मात्र जानवरों से क्रमिक विकास का परिणाम नहीं था, बल्कि प्रभु की विशेष रचना की क्रिया से उत्पन्न हुआ था। पशुरूप पूर्ण ईश्वरत्व को प्रकट कर पाने के हिसाब से अनगढ़ थे। आदमी को मस्तिष्क में संभावित रूप से सर्वज्ञ ‘सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल’ विशिष्ट रूप से दिया गया, साथ ही मेरु में तीक्ष्ण रूप से जागृत तंत्र केंद्र भी।  

प्रथम जोड़े में उपस्थित ईश्वर या दैवी चेतना ने, उन्हें सभी मानवीय संवेदनाओं का आनंद लेने के लिए सलाह दी, एक आपत्ति के साथ – काम में रुचि। यह वर्जित थी, अन्यथा मानवता स्वयं को प्रजनन की पाशवी पद्धति में उलझा लेगी। अवचेतन में मौजूद पशुवत् स्मृतियों को पुनर्जीवित नहीं करने की चेतावनी को अनसुना करके वापस पाशविक प्रजनन की ओर जा कर आदम और हव्वा दिव्य आनंद की अवस्था से गिर गए, जो संपूर्ण आदमी को नैसर्गिक रूप से प्राप्य थी। जब ‘उन्होंने जाना कि वे नग्न थे’, उनकी अमरत्व की चेतना खो गई। यद्यपि प्रभु ने उन्हें सावधान किया था, तब भी उन्होंने खुद को भौतिक नियमों के अधीन रख दिया; जिसके अंतर्गत शारीरिक जन्म के बाद शारीरिक मृत्यु अवश्यंभावी है।

हव्वा को सर्प के द्वारा दी गई ‘अच्छे और बुरे’  की जानकारी द्वैतवादी एवं विपरीतात्मक अनुभवों के संदर्भ में है, जिनमें से माया के अधीन नश्वर मनुष्यों को गुजरना पड़ेगा। अपनी भावना व तर्क के दुरुपयोग के कारण भ्रम में गिरकर, अर्थात् आदमी-औरत वाली चेतना पाकर, आदमी ने पूर्ण दैवी आत्मनिर्भरतायुक्त दिव्य  उद्यान में प्रवेश के अधिकार को त्याग दिया है। प्रत्येक मनुष्य की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है कि वह उसके मूल स्वभाव में यानी द्वैत के एकीकृत सामंजस्यपूर्ण स्वभाव Eden में पुनर्स्थापित कर दे।

गुरु से यह ज्ञान प्राप्त कर के श्री योगानंद स्वामी को पहली बार आदम और हव्वा के प्रति उचित संतान रूपी दायित्व का एहसास हुआ।

उत्पत्ति – बाइबल में से

Old antique Holy Bible Christian religion book open to the first page of Moses original chapter of genesis and text about god creation of heaven and hearth in the religious Ancient Testament

1  शुरूआत में परमेश्‍वर ने आकाश* और पृथ्वी की सृष्टि की।

2  पृथ्वी बेडौल और सूनी* थी। गहरे पानी* की सतह2 पर अँधेरा था और परमेश्‍वर की ज़ोरदार शक्‍ति* पानी की सतह के ऊपर यहाँ से वहाँ घूमती हुई काम कर रही थी।

3  परमेश्‍वर ने कहा, “उजाला हो जाए” और उजाला हो गया।

4 इसके बाद परमेश्‍वर ने देखा कि उजाला अच्छा है और परमेश्‍वर उजाले को अँधेरे से अलग करने लगा।

5  परमेश्‍वर ने उजाले को दिन कहा और अँधेरे को रात। फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह पहला दिन पूरा हुआ।
6  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “पानी ऊपर और नीचे की तरफ, दो हिस्सों में बँट जाए और बीच में खुली जगह* बन जाए जो ऊपर के हिस्से को नीचे के हिस्से से अलग करे।”

7  फिर परमेश्‍वर ने पानी को ऊपर और नीचे की तरफ दो हिस्सों में बाँट दिया और बीच में खुली जगह बनायी। और वैसा ही हो गया।

8  परमेश्‍वर ने उस खुली जगह को आसमान कहा। फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह दूसरा दिन पूरा हुआ।

9  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “आकाश के नीचे का सारा पानी एक जगह इकट्ठा हो जाए और सूखी ज़मीन दिखायी दे।” और वैसा ही हो गया।

10  परमेश्‍वर ने सूखी ज़मीन को धरती कहा, मगर जो पानी इकट्ठा हुआ था उसे समुंदर* कहा। और परमेश्‍वर ने देखा कि यह अच्छा है।

11  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “धरती पर घास, बीजवाले पौधे और ऐसे फलदार पेड़ जिनके फलों में बीज भी हों, अपनी-अपनी जाति के मुताबिक उगें।” और वैसा ही हो गया।

12 धरती से घास, बीजवाले पौधे और फलदार पेड़, जिनके फलों में बीज होते हैं अपनी-अपनी जाति के मुताबिक उगने लगे। तब परमेश्‍वर ने देखा कि यह अच्छा है।

13  फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह तीसरा दिन पूरा हुआ।

14  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “आसमान में रौशनी देनेवाली ज्योतियाँ चमकें जो दिन को रात से अलग करें। इन ज्योतियों की मदद से दिन, साल और मौसम का पता लगाया जाएगा।

15  ये ज्योतियाँ खुले आसमान में रौशनी देने का काम करेंगी जिससे धरती को रौशनी मिलेगी।” और वैसा ही हो गया।

16  परमेश्‍वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनायीं। जो ज्योति ज़्यादा बड़ी थी, उसे दिन पर अधिकार दिया और छोटी ज्योति को रात पर अधिकार दिया। परमेश्‍वर ने तारे भी बनाए।

17  इस तरह परमेश्‍वर ने उन्हें खुले आसमान में तैनात किया ताकि धरती को रौशनी मिले,

18  दिन और रात पर इनका अधिकार हो और उजाले को अँधेरे से अलग करें। तब परमेश्‍वर ने देखा कि यह अच्छा है।

19  फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह चौथा दिन पूरा हुआ।

20  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “पानी जीव-जंतुओं* के झुंडों से भर जाए और उड़नेवाले जीव धरती के ऊपर फैले आसमान में उड़ें।”

21  और परमेश्‍वर ने समुंदर में रहनेवाले बड़े-बड़े जंतुओं और तैरनेवाले दूसरे जंतुओं को उनकी अपनी-अपनी जाति के मुताबिक सिरजा जो पानी में झुंड बनाकर रहते हैं। उसने पंछियों और कीट-पतंगों को उनकी अपनी-अपनी जाति के मुताबिक सिरजा। और परमेश्‍वर ने देखा कि यह अच्छा है।

22  परमेश्‍वर ने उन्हें यह आशीष दी, “फूलो-फलो, गिनती में बढ़ जाओ और समुंदर को भर दो

22 और उड़नेवाले जीवों की गिनती पृथ्वी पर बहुत बढ़ जाए।”

23  फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह पाँचवाँ दिन पूरा हुआ।

24  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “ज़मीन पर अपनी-अपनी जाति के मुताबिक जीव-जंतु हों, पालतू जानवर, रेंगनेवाले जंतु* और जंगली जानवर हों।” और वैसा ही हो गया।

25  परमेश्‍वर ने धरती के जंगली जानवरों, पालतू जानवरों और ज़मीन पर रेंगनेवाले सब जंतुओं को उनकी अपनी-अपनी जाति के मुताबिक बनाया। और परमेश्‍वर ने देखा कि यह अच्छा है।

26  फिर परमेश्‍वर ने कहा, “आओ हम इंसान को अपनी छवि में, अपने जैसा बनाएँ। और वे समुंदर की मछलियों, आसमान के पंछियों, पालतू जानवरों और ज़मीन पर रेंगनेवाले सभी जंतुओं पर और सारी धरती पर अधिकार रखें।”

27  परमेश्‍वर ने अपनी छवि में इंसान की सृष्टि की, हाँ, उसने अपनी ही छवि में इंसान की सृष्टि की। उसने उन्हें नर और नारी बनाया।

28  फिर परमेश्‍वर ने उन्हें आशीष दी और उनसे कहा, “फूलो-फलो और गिनती में बढ़ जाओ, धरती को आबाद करो और इस पर अधिकार रखो। समुंदर की मछलियों, आसमान में उड़नेवाले जीवों और ज़मीन पर चलने-फिरनेवाले सब जीव-जंतुओं पर अधिकार रखो।”


29  फिर परमेश्‍वर ने उनसे कहा, “देखो, मैं तुम्हें धरती के सभी बीजवाले पौधे और ऐसे सभी पेड़ देता हूँ, जिन पर बीजवाले फल लगते हैं। ये तुम्हारे खाने के लिए हों।

30  और मैं धरती के सभी जंगली जानवरों, आसमान में उड़नेवाले सभी जीवों और बाकी सभी जीव-जंतुओं को, जिनमें जीवन है, खाने के लिए हरी घास और पेड़-पौधे देता हूँ।” और वैसा ही हो गया।

31  इसके बाद परमेश्‍वर ने वह सब देखा जो उसने बनाया था। वाह! सबकुछ बहुत बढ़िया था।

32 फिर शाम हुई और सुबह हुई। इस तरह छठा दिन पूरा हुआ।

33 इस तरह आकाश और पृथ्वी और जो कुछ उनमें है, उन सबको* बनाने का काम पूरा हुआ।

34 परमेश्‍वर जो काम कर रहा था,* उसे सातवें दिन से पहले उसने पूरा कर दिया। सारा काम पूरा करने के बाद सातवें दिन उसने विश्राम करना शुरू किया।  परमेश्‍वर ने सातवें दिन पर आशीष दी और ऐलान किया कि यह दिन पवित्र है, क्योंकि इस दिन से परमेश्‍वर सृष्टि के सारे कामों से विश्राम ले रहा है। परमेश्‍वर ने अपने मकसद के मुताबिक जो-जो बनाना चाहा था उसकी सृष्टि कर ली थी।

 यह उस वक्‍त का ब्यौरा है जब आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की गयी थी, वह दिन जब यहोवा* परमेश्‍वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया था।  मैदान में अब तक झाड़ियाँ और पौधे नहीं उगे थे, क्योंकि यहोवा परमेश्‍वर ने धरती पर पानी नहीं बरसाया था और ज़मीन जोतने के लिए कोई इंसान नहीं था। मगर धरती से कोहरा उठता और सारी ज़मीन को सींचता था।
 यहोवा परमेश्‍वर ने ज़मीन की मिट्टी से आदमी को रचा और उसके नथनों में जीवन की साँस फूँकी। तब वह जीता-जागता इंसान* बन गया।  यहोवा परमेश्‍वर ने पूरब की तरफ, अदन नाम के इलाके में एक बाग लगाया और वहाँ उसने आदमी को बसाया जिसे उसने रचा था यहोवा परमेश्‍वर ने ज़मीन से हर तरह के पेड़ उगाए जो दिखने में सुंदर और खाने के लिए अच्छे थे। उसने बाग के बीच में जीवन का पेड़ और अच्छे-बुरे के ज्ञान का पेड़ भी लगाया  अदन से एक नदी बहती थी जो बाग को सींचती थी और वह आगे जाकर चार नदियों में बँट गयी। पहली नदी का नाम है पीशोन। यह वही नदी है जो हवीला देश के चारों तरफ बहती है जहाँ सोना पाया जाता है। उस देश का सोना बढ़िया होता है। वहाँ गुग्गुल पौधे का गोंद और सुलेमानी पत्थर भी पाया जाता है। दूसरी नदी का नाम गीहोन है। यह वही नदी है जो कूश देश के चारों तरफ बहती है।  तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल* है। यही नदी अश्‍शूर देश के पूरब में बहती है। और चौथी नदी फरात है।
 यहोवा परमेश्‍वर ने आदमी को लेकर अदन के बाग में बसाया ताकि वह उसमें काम करे और उसकी देखभाल करे।  यहोवा परमेश्‍वर ने आदमी को यह आज्ञा भी दी, “तू बाग के हरेक पेड़ से जी-भरकर खा सकता है। मगर अच्छे-बुरे के ज्ञान का जो पेड़ है उसका फल तू हरगिज़ न खाना, क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उस दिन ज़रूर मर जाएगा।”

 फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “आदमी के लिए यह अच्छा नहीं कि वह अकेला ही रहे। मैं उसके लिए एक मददगार बनाऊँगा, ऐसा साथी जो उससे मेल खाए।”  यहोवा परमेश्‍वर ज़मीन की मिट्टी से मैदान के सब जंगली जानवर और आसमान में उड़नेवाले सारे जीव बनाता जा रहा था। वह उन्हें आदमी के पास लाने लगा ताकि देखे कि आदमी हरेक को क्या नाम देता है। आदमी ने उन जीव-जंतुओं को जिस-जिस नाम से पुकारा वही उनका नाम हो गया।  इस तरह आदमी ने सभी पालतू जानवरों, आसमान में उड़नेवाले जीवों और मैदान के सभी जंगली जानवरों के नाम रखे। मगर जहाँ तक आदमी की बात थी, उसके लिए कोई साथी और मददगार नहीं था जो उससे मेल खाता। इसलिए यहोवा परमेश्‍वर ने आदमी को गहरी नींद सुला दिया और जब वह सो रहा था, तो उसकी एक पसली निकाली और फिर चीरा बंद कर दिया। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदमी से जो पसली निकाली थी, उससे एक औरत बनायी और उसे आदमी के पास ले आया।

 तब आदमी ने कहा,“आखिरकार यह वह है जिसकी हड्डियाँ मेरी हड्डियों से रची गयी हैं,जिसका माँस मेरे माँस से बनाया गया है। यह नर में से निकाली गयी है, इसलिए यह नारी कहलाएगी।”इस वजह से आदमी अपने माता-पिता को छोड़ देगा और अपनी पत्नी से जुड़ा रहेगा* और वे दोनों एक तन होंगे।  आदमी और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, फिर भी वे शर्म महसूस नहीं करते थे।

यहोवा परमेश्‍वर ने जितने भी जंगली जानवर बनाए थे, उन सबमें साँप सबसे सतर्क रहनेवाला* जीव था। साँप ने औरत से कहा, “क्या यह सच है कि परमेश्‍वर ने तुमसे कहा है कि तुम इस बाग के किसी भी पेड़ का फल मत खाना?”  औरत ने साँप से कहा, “हम बाग के सब पेड़ों के फल खा सकते हैं। मगर जो पेड़ बाग के बीच में है उसके फल के बारे में परमेश्‍वर ने हमसे कहा है, ‘तुम उसका फल मत खाना, उसे छूना तक नहीं, वरना मर जाओगे।’” तब साँप ने औरत से कहा, “तुम हरगिज़ नहीं मरोगे।  परमेश्‍वर जानता है कि जिस दिन तुम उस पेड़ का फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, तुम परमेश्‍वर के जैसे हो जाओगे और खुद जान लोगे कि अच्छा क्या है और बुरा क्या।”
 इसलिए जब औरत ने पेड़ पर नज़र डाली तो उसे लगा कि उसका फल खाने के लिए अच्छा है और वह पेड़ उसकी आँखों को भाने लगा। हाँ, वह दिखने में बड़ा लुभावना लग रहा था। इसलिए वह उसका फल तोड़कर खाने लगी।7 बाद में जब उसका पति उसके साथ था, तो उसने उसे भी फल दिया और वह भी खाने लगा।  फिर उन दोनों की आँखें खुल गयीं और उन्हें एहसास हुआ कि वे नंगे हैं। इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़कर अपने लिए लंगोट जैसे बना लिए।

 फिर शाम के वक्‍त जब हवा चल रही थी, आदमी और उसकी पत्नी ने यहोवा परमेश्‍वर की आवाज़ सुनी जो बाग में चला आ रहा था। तब वे दोनों यहोवा परमेश्‍वर से छिपने के लिए पेड़ों के झुरमुट में चले गए।   और यहोवा परमेश्‍वर आदमी को पुकारता रहा, “तू कहाँ है?” आखिरकार आदमी ने कहा, “मैंने बाग में तेरी आवाज़ सुनी थी, मगर मैं तेरे सामने आने से डर गया क्योंकि मैं नंगा था। इसलिए मैं छिप गया।” तब परमेश्‍वर ने कहा, “तुझसे किसने कहा कि तू नंगा है? क्या तूने उस पेड़ का फल खाया है जिसके बारे में मैंने आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना?” आदमी ने कहा, “तूने यह जो औरत मुझे दी है, इसी ने मुझे उस पेड़ का फल दिया और मैंने खाया।”   तब यहोवा परमेश्‍वर ने औरत से कहा, “यह तूने क्या किया?” औरत ने जवाब दिया, “साँप ने मुझे बहका दिया इसीलिए मैंने खाया।” फिर यहोवा परमेश्‍वर ने साँप से कहा, “तूने यह जो किया है इस वजह से सब पालतू और जंगली जानवरों में से तू शापित ठहरेगा। तू अपने पेट के बल रेंगा करेगा और सारी ज़िंदगी धूल चाटेगा। और मैं तेरे और औरत के बीच और तेरे वंश और उसके वंश* के बीच दुश्‍मनी पैदा करूँगा। वह तेरा सिर कुचल डालेगा* और तू उसकी एड़ी को घायल करेगा।”*
 परमेश्‍वर ने औरत से कहा, “मैं तेरे गर्भ के दिनों का दर्द बहुत बढ़ा दूँगा। तू दर्द से तड़पती हुई बच्चे पैदा करेगी। तू अपने पति का साथ पाने के लिए तरसती रहेगी और वह तुझ पर हुक्म चलाएगा।”  और परमेश्‍वर ने आदम* से कहा, “तूने अपनी पत्नी की बात मानकर उस पेड़ का फल खा लिया जिसके बारे में मैंने आज्ञा दी थी कि तू मत खाना। इसलिए तेरी वजह से ज़मीन शापित है। तू सारी ज़िंदगी दुख-दर्द के साथ इसकी उपज खाया करेगा। ज़मीन पर काँटे और कँटीली झाड़ियाँ उगेंगी और तू खेत की उपज खाया करेगा। सारी ज़िंदगी तुझे रोटी* के लिए पसीना बहाना होगा और आखिर में तू मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी से बनाया गया है। तू मिट्टी ही है और वापस मिट्टी में मिल जाएगा।”

 इसके बाद, आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा* रखा क्योंकि वह दुनिया में जीनेवाले सभी इंसानों की माँ बनती।  और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े की लंबी-लंबी पोशाकें बनायीं। फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “अब इंसान इस मायने में हमारे बराबर हो गया है कि वह खुद जानने लगा है* कि अच्छा क्या है और बुरा क्या। अब कहीं ऐसा न हो कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के पेड़ का फल भी तोड़कर खा ले और हमेशा तक जीता रहे,—”   तब यहोवा परमेश्‍वर ने उसे अदन के बाग से बाहर निकाल दिया ताकि वह उस ज़मीन को जोते जिसकी मिट्टी से उसे बनाया गया था। उसने इंसान को बाहर खदेड़ दिया और जीवन के पेड़ तक जानेवाले रास्ते का पहरा देने के लिए अदन के बाग के पूरब में करूब तैनात किए और लगातार घूमनेवाली एक तलवार भी रखी जिससे आग की लपटें निकल रही थीं।

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