ज्योतिष विज्ञान

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स्वामी योगानंद जी द्वारा लिखी ‘ऑटो बायोग्राफी ऑफ ए योगी’ में उनके श्रद्धेय गुरु श्री युक्तेश्वर गिरी ने ज्योतिष के पीछे विज्ञान का इन शब्दों में उल्लेख किया है:

यह प्रश्न विश्वास का नहीं है; किसी भी विषय पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण जो रखना चाहिए वह है कि,  क्या यह सत्य है । पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत न्यूटन से पहले भी उतना ही कारगर था जितना उसके बाद । यह ब्रह्मांड काफी अव्यवस्थित हो जाएगा अगर इसके नियम मानवी विश्वास के बिना कारगर नहीं हो सकें ।

सृष्टि के सभी भाग आपस में जुड़े हुए हैं और अपने प्रभाव का आदान-प्रदान करते हैं । संसार की संतुलित लय का आधार पारस्परिकता है ।

ज्योतिष विज्ञान ग्रहों के उत्तेजन के प्रति मनुष्य की अनुक्रिया का अध्ययन है । सितारों में कोई सचेत भलाई या वैर भाव नहीं होता; वे केवल सकारात्मक व नकारात्मक किरणें प्रसारित करते रहते हैं । अपने आप में मानव जाति की कोई सहायता या हानि नहीं करते, लेकिन कार्य कारण समतुल्यता के परिचालन के लिए एक न्याय संगत मार्ग प्रदान करते हैं जो प्रत्येक मनुष्य ने भूतकाल में गतिमान किया है ।

एक शिशु उस दिन उस घड़ी में जन्म लेता है जब आकाशीय किरणें उसके व्यक्तिगत कर्म के गणितीय सामंजस्य में होती हैं । उसकी जन्मपत्री एक चुनौतीपूर्ण चित्र है जो उसके अपरिवर्तनीय भूत को प्रकट करता है और इसके संभावित भविष्य परिणाम को भी ।  लेकिन जन्म संबंधी लेखा चित्र का सही विवेचन कोई सहज ज्ञानी ही कर सकता है, ऐसे लोग कम हैं। जन्म के क्षण पर लोकों के आर-पार स्पष्ट चिन्हित संदेश भाग्य पर महत्व देने के अभिप्राय से नहीं हैं – पिछले अच्छे और बुरे कर्मों का फल – बल्कि मनुष्य की इच्छा शक्ति को जागृत करके उसे लौकिक दासता से मुक्त कराने के लिए है । जो उसने किया है, उसे वह अकृत कर सकता है । जो भी परिणाम आज उसके जीवन में प्रबल हैं, उनके मूल कारण का प्रोत्साहक उसके स्वयं के अतिरिक्त  कोई नहीं है । वह किसी भी सीमा को लांघ सकता है, क्योंकि उसने अपने कार्यों से इन का सृजन किया था और क्योंकि वह आध्यात्मिक संसाधनों का स्वामी है, जो ग्रह संबंधी दबाव के अधीन नहीं हैं। ज्योतिष के प्रति अंधविश्वासी विस्मय मनुष्य को स्वचालन पर डाल देता है, यांत्रिक निर्देशन पर गुलाम की तरह निर्भर होना । बुद्धिजीवी अपने ग्रहों को हरा देता है अर्थात् अपनी निष्ठा को रचना से रचयिता की ओर बदली करके । जितना अधिक वह आत्मा के साथ एकता का अनुभव करता है, उतना कम पदार्थ उस पर हावी होते हैं । आत्मा सदैव स्वच्छंद है; यह अमर है, क्योंकि अजन्मी है । इसे सितारे अनुशासित नहीं कर सकते । परमेश्वर समरसता में बसता है । जो श्रद्धालु भक्त स्वयं को उसके सुर में मिला लेता है, वह कोई अनुचित कार्य नहीं करेगा । उसके कार्य कलाप ज्योतिषीय नियमों  के अनुरूप सही ढंग से और स्वाभाविक रूप से सामयिक होंगे। गहन आराधना तथा चिंतन के बाद वह अपनी दिव्य चेतना के संपर्क में रहता है, इस आंतरिक संरक्षण से बड़ी कोई शक्ति नहीं है।

जब कोई यात्री अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है, केवल तभी उसके लिए नक्शे का त्याग करना न्यायोचित है ।यात्रा के दौरान वह किसी सुविधाजनक लघु मार्ग का लाभ लेता है । प्राचीन ऋषियों ने अनेक रास्ते खोजे, जिससे मनुष्य की माया में प्रवास की अवधि छोटी हो सके । कर्म के सिद्धांत में कुछ यंत्र व लक्षण होते हैं, जिन्हें विद्वत्ता की उंगलियों से कुशलता पूर्वक नियमित किया जा सकता है ।सभी मानवीय व्याधियाँ, लौकिक नियमों के उल्लंघन से आरंभ होती हैं। धर्म ग्रंथ इस ओर इशारा करते हैं, कि व्यक्ति को प्रकृति के नियमों को संतुष्ट करना चाहिए, दैवी  सर्व शक्ति पर संदेह ना करते हुए । उसे कहना चाहिए, “हे प्रभु, मुझे आप में विश्वास है और मैं जानता हूं कि आप मेरी सहायता कर सकते हैं । लेकिन मैं भी अपनी गलतियों को सुधारने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ करूंगा ।” अनेक तरीकों से – जैसे प्रार्थना, आत्मविश्वास, योग साधना, संतो के साथ परामर्श, ज्योतिष चूड़ी/कड़े का प्रयोग – पिछली गलतियों के दुष्प्रभाव को न्यून या खत्म किया जा सकता है।

जैसे एक घर में लगाई गई तांबे की छड़ी बिजली गिरने के झटके को सोख लेती है, बिल्कुल वैसे शरीर रूपी मंदिर की रक्षा भी कई प्रकार से की जा सकती है । जगत में विद्युत एवं चुंबकीय विकिरण सतत प्रसारित हो रहे हैं । वे मनुष्य के शरीर को अच्छे या बुरे रूप में प्रभावित करते हैं । युगों पूर्व हमारे ऋषियों ने ब्रह्मांड के सूक्ष्म प्रभावों के प्रतिकूल असर से जूझने की समस्या पर विचार किया । संतों ने खोज में यह पाया, कि शुद्ध धातुएं एक नक्षत्रीय प्रकाश छोड़ती हैं, जो ग्रहों के नकारात्मक खिंचाव को काटने में सक्षम हैं। कुछ वनस्पति मिश्रण भी सहायक पाए गए हैं । कम से कम 2 कैरेट के दोष रहित रत्न सर्वाधिक प्रभावी है ।

ज्योतिष के व्यवहारिक रोग निरोधी उपयोगों पर भारत के बाहर शायद ही कभी गंभीर अध्ययन हुआ है। यह तथ्य अज्ञात है कि शुद्ध रत्न, धातुएं तथा वनस्पतिक औषधियां मूल्यहीन है, जब तक उपचारात्मक पदार्थ को त्वचा के साथ लगा कर ना पहना जाए ।

एक ज्योतिष विज्ञान है जो कैलेंडर या घड़ी पर आश्रित नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति निर्माता का अंश है – एक ब्रह्मांडीय मानव । उसका एक स्वर्गीय शरीर है,  पार्थिव शरीर के साथ साथ । मानवीय आंख भौतिक आकार को देखती है लेकिन आंतरिक नेत्र और गहराई तक पता लगा सकते हैं यहाँ तक कि सर्वव्याप्त शरीर का भी, जिसका प्रत्येक व्यक्ति एक आधारभूत एवं विशिष्ट अंग है।  

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